युयुत्सु
नहीं मात्र एक व्यक्ति
एक परम्परा है
वैसे ही जैसे प्रतिशोधी आग में
पैशाचिकता के सीमांत पर
खडा अश्वत्थामा
आत्मघात के बावजूद
मरा नहीं युयुत्सु
दरअसल हारा नहीं है वो
हारता रहा है वह हर व्यक्ति
समझा नहीं है जो उसका मंतव्य.
सत्य-समर्थन के बावजूद
नायक नहीं बनता युयुत्सु
नहीं चाहता कोई भी -– सत्य साक्षात्कार
नहीं होता अगर,
आत्म- हितार्थ
और अश्वत्थामा भी समाप्त नहीं होता कभी
जैसे समाप्त नहीं होता
अंधों का युग –- अंधायुग
और अंधायुग
वह भी तो एक परम्परा है
नहीं मात्र एक काल-खंड
वही परम्परा चली आती है आज भी.